पुस्तक समीक्षा: रानी पद्मिनी – चित्तौड़ का प्रथम जोहर — ब्रजेन्द्र कुमार सिंघल

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पिछले कुछ दिनों से रानी पद्मिनी और चित्तौड़ काफी चर्चा में थे। संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावत पर कैसा बवाल मचा ये सभी जानते हैं। इस प्रकरण के बाद से ही रानी पद्मिनी के बारे में और जानने की इच्छा हुई। इसी सन्दर्भ में वाणी प्रकाशन द्धारा प्रकाशित, श्री ब्रजेन्द्र कुमार सिंघल का उपन्यास “रानी पद्मिनी – चित्तोड़ का प्रथम जोहर” पढ़ने का मौका मिला।

जब उपन्यास प्राप्त हुआ तो बड़ी प्रसन्नता हुई किन्तु पहला पृष्ठ खोलते ही थोड़ी निराशा हुई, क्योंकि ये किताब पूर्ण गद्य नहीं है। जब आप इसे पढ़ना शुरू करेंगे तो पहले पृष्ठ से आपको पता चल जाएगा कि ये पुस्तक दोहों से भरी है।

अच्छी बात ये है कि हर दोहों का अर्थ हिंदी में दिया गया है। इसमें राजस्थानी भाषा और संस्कृति की झलक साफ नजर आती है। हालाँकि ये स्पष्ट नहीं है कि दोहों का जो अर्थ हिंदी में दिया गया है वो पुस्तक का वास्तविक स्वरुप है अथवा केवल पाठक की सुविधा के लिए ऐसा किया गया है।

अब कथा पर आते हैं। अगर सरसरी तौर पर देखा जाये तो इसकी कथा वही है जिसके बारे में वर्णन हमें मिलता है। अगर हम मलिक मुहम्मद जायसी की रचना “पद्मावत” से इसकी तुलना करें तो थोड़ा अंतर पाएंगे। इस उपन्यास को थोड़ा अधिक प्रामाणिक रखने का प्रयास किया गया है जो इसे थोड़ा वास्तविकता के निकट लाता है। एक बात जो इस उपन्यास में सबसे अच्छी है वो ये कि कथा रानी पद्मिनी और चित्तोड़ के इर्द-गिर्द घूमती है। रानी पद्मिनी का चरित्र महान तो दिखाया गया है किन्तु इसे अति-महानता से बचा कर रखा गया है जिससे कथा थोड़ी वास्तविक लगती है। रानी पद्मिनी राजपूत होते हुए भी अपने पति के हरण पर चिंतित दिखाई देती है और उनका आत्मविश्वास डगमगाता है जो बिलकुल स्वाभाविक लगता है। कुल मिलकर बात ये है कि इस उपन्यास में आपको रानी पद्मिनी का चित्रण अति-नाटकीय नहीं लगता जैसा फिल्म में दिखाया गया है और ये बात पुस्तक के पक्ष में जाती है।

रानी पद्मिनी और रतनसेन के प्रकरण में गोरा और बादल जैसे वीरों की क्या भूमिका थी इसे इस उपन्यास में विस्तार से बताया गया है। रानी पद्मिनी के महत्त्व के साथ साथ उनका महत्त्व भी उजागर होता है। रतनसेन द्धारा खिलजी की शर्त मानने के समय गोरा का क्रोध बड़े सही तरीके से दिखाया गया है।

रतनसेन का का चरित्र भी अति-नाटकीय होने से बचाया गया है। राजपूती वीरता के साथ अपने राज्य को बचाने की जद्दोजहद का अच्छी तरह से चित्रण किया गया है। सबसे अच्छी बात इस पुस्तक की ये है कि खिलजी को किसी भी प्रकार से महिमामंडित नहीं किया गया है। एक शासक के रूप में खिलजी की कुछ योग्यता दिखती है लेकिन कहीं भी ऐसा नहीं है जब उसे राजपूतों से ऊपर या महान दिखाया गया हो।

इस किताब में आपको रानी पद्मिनी के विषय में कुछ ऐसी चीज़ें जानने को मिलेगी जो शायद आप ना जानते हों। इस पुस्तक में बस एक समस्या है कि ये दोहों के रूप में है और इसी कारणवश लेखन के बारे में ज्यादा नहीं कहा जा सकता। लेखक मूल रूप से राजस्थान से ही है तो विषय और कथा पर उनकी पकड़ अच्छी है।

कुल मिलकर अगर आप रानी पद्मिनी या इस प्रसंग के बारे में कुछ अधिक जानना चाहते हैं और अपने आपको दोहों और छंदों के बीच संतुलित कर सकते हैं तो आपको ये उपन्यास पसंद आएगा।

समीक्षक — नीलाभ वर्मा

नीलाभ वर्मा पेशे से इंजीनियर हैं और लेखन उनका शौक़ है। इन्हें पढ़ने का शौक़ है। हिंदी साहित्य की ओर इनका विशेष झुकाव है। पौराणिक उपन्यास, स्वयंवर, के लेखक हैं। इनका ब्लॉग, धर्मसंसार, भारत का पहला धार्मिक ब्लॉग है।

Blog: www.dharmsansar.com/ Twitter: @NilabhVerma

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Tarang
Tarang Sinha is a freelance writer & author of 'We Will Meet Again'. Her works have been published in magazines like Good Housekeeping India, Child India, New Woman, Woman's Era, Alive, and a best-selling anthology @ Uff Ye Emotions 2.
http://tarangsinha.blogspot.in/

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