‘नयी वाली हिंदी’ और नए ज़माने के 5 लोकप्रिय लेखक

ये देखकर ख़ुशी होती है कि आज कल के कई लेखक हिंदी किताबें लिख रहे हैं। और इससे भी ज्यादा ख़ुशी की बात ये है कि हिंदी की किताबें और उनके लेखक काफी सफल और लोकप्रिय हैं। ये किताबें बेस्टसेलर्स की श्रेणी में आ रही हैं।

हिंदी साहित्य ने एक नया मोड़ ले लिया है। ये नयी वाली हिंदी हैं।

‘नयी वाली हिंदी’ का मतलब क्या है? मैंने जितनी भी आजकल की हिंदी किताबें पढ़ीं हैं, उनमे एक ख़ास बात नज़र आती हैं। कि वो बेबाक हैं। उनकी भाषा सरल है। घटनाएं असल ज़िन्दगी से मेल खाती हैं। संवाद हलके फुल्के होते हैं — जैसे की आजकल के युवा असल ज़िन्दगी में बातें करते हैं।

तो यही है नयी वाली हिंदी! जिसने हिंदी साहित्य में आम तौर पर देखी  जाने वाली क्लिष्टता से थोड़ी सी दूरी बनाकर रखी है। ऐसी हिंदी जिससे पाठक अपने आप को आसानी से जोड़ पाते हैं।

आज हम बातें करेंगे नयी वाली हिंदी के पांच सफल कहानीकारों से —

 

दिव्य प्रकाश दुबे 

 

 

 

 

‘ज़िन्दगी की सबसे अच्छी और बुरी बात ये है कि ये हमेशा नहीं रहने वाली। ‘ — मुसाफिर कैफ़े

दिव्य प्रकाश दुबे का मानना है की ‘हिंदी कूल है। ‘

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के दिव्य प्रकाश जी तीन बेस्टसेलिंग किताबों के लेखक हैं। अगर आप हिंदी किताबें पढ़ते हैं, तो आपने उनकी किताबों — मसाला चाय, टर्म्स & कंडीशंस अप्लाई और मुसाफिर कैफ़े — का नाम ज़रूर सुना होगा।

दिव्य जी नए ज़माने के सफलतम हिंदी लेखकों में से एक हैं। इनके लिखने की शुरुआत दरअसल कॉलेज में एक कल्चरल फेस्ट के लिए प्ले लिखने से हुई। इनके लिखने का अंदाज़ काफी हल्का फुल्का है। उनके कैरक्टर्स लिखी हुई हिंदी में नहीं बल्कि वो वैसे ही बोलते हैं जैसे वो ‘सही’ में हैं।

अगर मौका मिले तो आप इनका TEDx स्पीच जरूर देखिये। ये मज़ेदार भी होती हैं, और आपको सोचने पे भी मजबूर करती हैं। उनकी अगली किताब, जो की एक उपन्यास है, इस साल जुलाई-अगस्त तक रिलीज़ होगी।

 

 

 

 

 

 

‘एक नीला स्कार्फ़ ही था,
कि निकला था, किसी अलमारी से
बड़े दिनों बाद, भूले-भटके कहीं।’

अनु सिंह चौधरी जी हिंदी की चर्चित लेखिकाओं में एक हैं। ‘नीला स्कार्फ़ और मम्मा की डायरी’ उनकी दो किताबें हैं। सिवान (बिहार) में पैदा हुई, राँची (झारखंड) में पली-बढ़ी, अनु जी ने दिल्ली यूनिवर्सिटी (लेडी श्रीराम कॉलेज) और भारतीय जनसंचार संस्थान (जिसको आईआईएमसी भी कहते हैं) से पढ़ाई की।

इन्होने रेडियो पर नीलेश मिसरा के शो के लिए कहानियाँ लिखीं। 2007 में उन्होंने अपनी पहली डॉक्युमेंट्री – ‘लाइटिंग अप द हिल्स’बनायी जो झारखंड के जंगलों में पहाड़िया आदिवासियों पर आधारित है। इतना ही नहीं, अनु जी ने ‘द गुड गर्ल शो’ नाम की एक वेब सीरिज़ लिखी और डायरेक्ट की है। आप इसे यू ट्यूब पे देख सकते हैं।

इनका अगला उपन्यास दिल्ली यूनिवर्सिटी की पृष्ठभूमि पर आधारित है।

 

 

 

 

‘प्रेम के कारण नहीं होते; परिणाम होते है पर प्रेम में परिणाम की चिंता तबतक नहीं होती जबतक देर न हो जाए।’ — दिल्ली दरबार

सत्य व्यास हिंदी के सफल लेखक हैं। उन्होंने बनारस टाकीज़ और दिल्ली दरबार नाम के दो उपन्यास लिखे हैं। हालाँकि दोनों किताबें सफल रहीं हैं पर ‘दिल्ली दरबार’ काफी चर्चा में रही। इनकी कहानियों में आपको हास्य और व्यंग की झलक मिलेगी।
जैसे —
‘इसकी शिकायत करते करते प्रिंसिपल रिटायर हो गया। इतनी बार शिकायत आयी है कि इसके कॉलेज में इससे ज्यादा अटेंडेंस तो मेरा होगा।’ — दिल्ली दरबार

मूल रूप से बिहार के रहने वाले हैं पर ये चाहते हैं की इन्हें कॉस्मोपॉलिटन कहा जाये।

 

‘कभी तिराहे पर, कभी आँगन में टांगा
कभी किसी खटिया, तो खूँटी से बाँधा
कभी मतलब से, कभी यूं ही नकारा
कभी जी चाहा तो, खूब दिल से पुकारा
कभी पैसों से, कभी बेमोल ही खरीदा
मुझे पा लेने का बस यही तो है तरीका
नाम था मेरा भी, पर किसे थी जरूरत
कहते हैं लोग मुझे ऐसी वैसी औरत। ‘मध्यप्रदेश की रहने वाली अंकिता जैन, एक उभरती हुई लेखिका हैं। इनकी पहली किताब ‘ऐसी वैसी औरत’ जो कि एक कहानी संग्रह है काफी चर्चित रही। एक कहानीकार होने के साथ-साथ, अंकिता जी एक कॉलमनिस्ट और सम्पादक भी हैं।2014 में विश्व हिंदी संस्थान, मोरिसियस द्धारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय हिंदी कहानी प्रतियोगिता में उनकी लिखी कहानी “प्रायश्चित” को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दस सर्वश्रेष्ठ कहानियों में स्थान मिला। रेडियो-ऍफ़एम् के दो प्रसिद्ध शो “यादों का इडियट बॉक्स विथ नीलेश मिश्रा” एवं “यूपी की कहानियाँ” में बतौर कहानी लेखक काम कर रही हैं, और अब तक लगभग 25 कहानियाँ लिख चुकी हैं, इन कहानियों को आप यूट्यूब पर सुन सकते हैं।

 

 

 

 

 

 

‘इन स्कूलों के लड़के इतने उत्साही और आशावान हुआ करते थे कि मोहल्ले में यदि कोई लड़की इनकी तरफ़ मुस्कुरा कर देख भर ले तो ये मन ही मन उसे अपनी धर्मपत्नी मान लिया करते थे और उनके समस्त दोस्त लड़की को तब तक भाभी कहकर बुलाते थे जब तक कि वो कहीं और सेट नहीं हो जाती थी।’ — यू पी – 65

कानपुर में पले बढ़े निखिल जी ने अपनी पढ़ाई IIT-BHU से की है। इनको शुरू से ही कहानी और कवितायें लिखने का शौक़ रहा है। उनकी पहली (नमक स्वादानुसार) और दूसरी (ज़िन्दगी आइस पाइस) किताब कहानियों का संग्रह है। उनकी तीसरी किताब ‘यू पी – 65’ एक उपन्यास है जो IIT के जीवन को दर्शता है और इसमें एक छोटी सी लव स्टोरी की भी झलक मिलती है।

निखिल जी को ‘हिंदी का चेतन भगत’ कहा जाता है, हालांकि उनको ये उपमा कुछ ख़ास पसंद नहीं है।

नए ज़माने के लेखकों में आपके फेवरेट कौन हैं?

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Tarang
Tarang Sinha is a freelance writer & author of 'We Will Meet Again'. Her works have been published in magazines like Good Housekeeping India, Child India, New Woman, Woman's Era, Alive, and a best-selling anthology @ Uff Ye Emotions 2.
http://tarangsinha.blogspot.in/

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