मेरे बचपन की लाइब्रेरी से

जो मुझे करीब से जानते हैं, वो कहते हैं की किताबों को देखकर मेरी आँखों में चमक आ जाती है। अगर आप किताबों से प्यार करते हैं तो आप ये समझ सकते हैं। सोचिये अगर आपको पूरी की पूरी लाइब्रेरी मिल जाए तो?

मुझे बचपन से ही पढ़ने का शौक रहा है। एक पारिवारिक समारोह में, मेरे एक रिश्तेदार ने मुझे किताबों में उलझे देखा तो कहा, ‘इसे अगर विज्ञापन भी मिल जाए तो उसे भी पढ़ लेगी।’

मेरा बचपन हिंदी किताबें पढ़कर बीता है। स्वाभाविक है – मेरी दसवीं तक की पढाई हिंदी माध्यम से हुई है तो ज्यादातर हिंदी किताबें ही पढ़ा करती थी मैं। मुझे याद है – वो छोटा सा कमरा और उसमें बड़ी सी अलमारी, जिसपर ढेरों किताबें। मुझे हर तरह की किताबें पसंद थीं – कॉमिक्स, लघु कथाओं की किताबें जैसे, नंदन और चम्पक, पर उपन्यास पढ़ने का एक अलग ही शौक़ होता था। पर मेरे दादाजी की कुछ शर्तें थीं। नहीं, उन्होंने हमें पढ़ने से कभी नहीं रोका, बल्कि मेरी पढ़ने की आदत मुझे मेरे दादाजी और दादी माँ से ही मिली है, और इसके लिए मैं उनकी हमेशा शुक्रगुज़ार रहूंगी। पर उनका मानना था की कुछ किताबें मेरे लिए ‘उपयुक्त’ नहीं थीं।

‘बच्चे उपन्यास नहीं पढ़ा करते, कहानियां पढ़ा करो। बच्चों वाली किताबें,’ वो कहते।

फिर मुझे बच्चों वाली किताबें दी गयी। मेरा पहला लघु-उपन्यास था – कृष्ण चन्दर द्धारा लिखित ‘सितारों से आगे’। बहुत अच्छी तरह तो याद नहीं, मगर ये एक फैंटसी थी। दो बच्चों की कहानी जो चाँद पर जाते हैं और वहां उन्हें एक ऐसी जगह मिलती है जहाँ सबकुछ उल्टा होता है! बहुत अनोखा अनुभव था। कहानी तो मज़ेदार थी ही, पर छोटी उम्र में पूरी की पूरी किताब पढ़ जाने का अनुभव पहला और अलग था।

अब तो उपन्यास पढ़ने की आदत लग चुकी थी। तब मेरा परिचय हुआ प्रोफेसर दिवाकर की किताबों से। प्रोफेसर दिवाकर साइंस फिक्शन लिखते थे और उनकी किताबें काफी रोमांचक होती थीं। हम, मैं और मेरा छोटा भाई, उनकी किताबों को पढ़ते और फिर उसके बारे में घंटों बातें करते। काफी सालों बाद मैंने उनका एक उपन्यास, ‘शुक्र ग्रह पर धावा’ दुबारा पढ़ा और मुझे आश्चर्य हुआ की मुझे उस किताब को पढ़ने में उतना ही मज़ा आया जितना एक टीनएजर के तौर पर आया था। अफ़सोस की बात ये थी की काफी ढूंढने पर भी हमेें उनकी अन्य किताबें (जो हमारे पास नहीं थीं) नहीं मिली।
अब इसके बाद क्या? सारी किताबें तो जल्दी जल्दी पढ़ ली? वो कहते हैं न, आपको जिस बात के लिए मना किया जाए, आप उसके प्रति और ज्यादा उत्सुक हो जाते हैं।

‘लाइब्रेरी में इतनी सारी किताबें है तो मैं गिनी चुनी किताबें ही क्यों पढूं?’

तो बस, लाइब्रेरी से किताबें (चुपके से) निकलने लगीं – मेरे कमरे का दरवाज़ा बंद और मैं पढ़ने में मग्न। मेरी पहली ‘बड़ों वाली किताब’ थी शरतचंद्र की स्वामी जिसे मन्नू भंडारी ने रूपांतरित किया है। ये आजतक मेरे पसंदीदा उपन्यासों में से एक है। इसे पढ़ने के बाद, मैंने हर उस इंसान को ये किताब पढ़ने की सलाह दी जिन्हें पढ़ने का शौक़ था। रफ़ीआ मंजुरूल अमीन की ‘आलमपनाह’ और धर्मवीर भारती की ‘गुनाहों का देवता’ दो बेहतरीन उपन्यास हैं जो मैंने दो-दो बार पढ़ी हैं। फिर, झील के उस पार, पाले खां, स्वयंसिद्धा, नीलकमल, दत्ता, देवदास, गृहदाह, चरित्रहीन, और जाने कितनी।

और फिर…. मैं बड़ी हो गायी। अंग्रेजी में मेरी रूचि तो थी ही, रुझान भी बढ़ता चला गया। मेरी अपनी कलेक्शन (लाइब्रेरी नहीं कह सकती) तैयार होने लगी – अंग्रेजी किताबों की। ये सच है की अब मैं अंग्रेजी किताबें पढ़ती हूँ, अंग्रेजी में लिखती हूँ, पर हिंदी में लिखने और पढ़ने का अपना अलग ही आनंद है। अगर आप हिंदी में लिखते हैं या हिंदी किताबें पढ़ना पसंद करते हैं, तो आपने ये जरूर अनुभव किया होगा।

 

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Tarang
Tarang Sinha is a freelance writer & author of 'We Will Meet Again'. Her works have been published in magazines like Good Housekeeping India, Child India, New Woman, Woman's Era, Alive, and a best-selling anthology @ Uff Ye Emotions 2.
http://tarangsinha.blogspot.in/

2 thoughts on “मेरे बचपन की लाइब्रेरी से

  1. एक अच्छा आलेख। आपने सही कहा हिन्दी में पढ़ने का अपना अलग मज़ा है। उम्मीद है आप भी हिन्दी में लिखेंगी। प्रोफेसर दिवाकर के विषय में पढ़ने के बाद उनकी रचनायें पढ़ने की उत्सुकता हुई है .आपके दूसरे ब्लॉग में उनके कुछ उपन्यासों के नाम हैं तो ढूँढने में आसानी होगी। वैसे उनका पूरा नाम बता सकें तो मेहरबानी होगी।

    1. शुक्रिया!
      उनकी रचनाएं वाकई काफ़ी दिलचस्प हुआ करती थीं। आजकल उनकी किताबें मिलना मुश्किल है।
      ये मेरे ब्लॉग पे प्रोफ. दिवाकर की किताबों के बारे में एक लेख।
      http://tarangsinha.blogspot.in/2010/11/who-is-professor-diwaakar.html

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