पुस्तक समीक्षा: हलाला — भगवानदास मोरवाल

जैसा कि किताब के शीर्षक से पता चलता है, हलाला मुस्लिम समुदाय के एक अज़ीबो-ग़रीब प्रथा के ऊपर आधारित है। वैसे तो ये बताने की ज़रूरत नहीं है शायद, पर फिर भी —  शरिया के मुताबिक़, तीन तलाक़ के बाद पति अपनी पत्नी से तबतक दुबारा शादी नहीं कर सकता जबतक उस औरत की दूसरी शादी होकर उस मर्द से तलाक न हो जाए। इतना ही नहीं, तलाक से पहले उस औरत को उस आदमी के साथ सम्बन्ध बनाना ज़रूरी है।

कहने को तो ये पति को आवेश में आकर लिए गए उसके निर्णय की सज़ा माना जाता है, पर इस प्रथा की आड़ में एक औरत कितना अपमानित महसूस करती है, ये सोचने की ज़ेहमत कोई नहीं उठाता।

वाणी प्रकाशन द्धारा प्रकाशित, भगवानदास मोरवाल की ये किताब इसी सामयिक और संवेदनशील मुद्दे को चुनौती देती नज़र आती है। ये किताब एक अनुचित और अविवेकपूर्ण प्रथा पर एक प्रहार है।

‘बुरा न माने तो एक बात पूछूं दादा, हम कोई लत्ता-कपड़ा हैं के जब जी करे पहर लेओ, और जब जी करे उन्ने उतार के फ़ेंक देओ ?’

डमरू एक सीधा साधा आदमी है जो देखने में बिलकुल भी अच्छा नहीं है। वो इतना कुरूप है कि उसकी एक भाभी उसे ‘कलसंडा’ कहकर सम्बोधित करती है। चार भाइयों में सबसे छोटे डमरू को उसके अपने प्यार तो करते हैं पर कोई उसे इतना महत्व नहीं देता।

दूसरी तरफ, नज़राना एक खूबसूरत और ज़हीन औरत है, जिसके पति नियाज़ ने ग़ुस्से में आकर, बेवज़ह, उसे तीन तलाक़ दे दिया है। पर अब नज़राना जैसी अच्छी और सुलझी हुई पत्नी और बहु को खोकर नियाज़ और उसका परिवार पछता रहा है।

नज़राना को वापस अपनी ज़िन्दगी में लाने का एक ही तरीका है — निक़ाह हलाला।

बहुत सोच विचार कर, न चाहते हुए भी, नज़राना का निकाह डमरू के साथ कर दिया जाता है। अब आगे क्या होगा? क्या डमरू जैसा सीधा सादा आदमी और नज़राना जैसी ज़हीन औरत हलाला की शर्त पूरी कर पाएंगे? क्या है इनके निकाह की मंज़िल? ये जानने के लिए आपको ‘हलाला’ पढ़नी होगी।

अगर एक शब्द में इस किताब को परिभाषित करना चाहूँ, तो वो होगा — बेबाक!

ये किताब हरियाणा के मेवात जिले में रहने वाले मुस्लिम परिवार की ज़िन्दगी को बहुत जीवंत तरीके के उकेरती है। उनकी भाषा, उनकी सोच और जीवन-शैली का बहुत अच्छा चित्रण है। किरदार बहुत सहज और वास्तविक लगते हैं। हालांकि इस कहानी का मुद्दा और इसका प्रसंग औरत की दयनीयता और उसकी बेबसी से जुड़ा हुआ है, परन्तु इस कहानी की महिलायें कमज़ोर नहीं हैं, और यही इस कहानी की ताक़त है।

‘दादा, मेरी आबरू तो या आदमी ने वाही दिन तार-तार कर दी ही, जा दिन याने चौड़ा में मेरो आसरा छीन लियो हो, और मैं एक पराया मरद के संग सोण कू मजबूर कर दी ही।’

इस किताब को लेकर मेरी बस एक ही समस्या रही — इसके संवाद। संवाद में बहुत सारी गालियां है और सारे संवाद मेवाती भाषा में हैं। मैं ये समझ सकती हूँ के प्रादेशिक भाषा का उपयोग किरदारों को और जीवंत बनाते हैं मगर उसका उपयोग कभी कभी हो तो बेहतर होता है। हर पाठक उस प्रदेश का नहीं होगा, इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है।

2106

Tarang
Tarang Sinha is a freelance writer & author of 'We Will Meet Again'. Her works have been published in magazines like Good Housekeeping India, Child India, New Woman, Woman's Era, Alive, and a best-selling anthology @ Uff Ye Emotions 2.
http://tarangsinha.blogspot.in/

2 thoughts on “पुस्तक समीक्षा: हलाला — भगवानदास मोरवाल

  1. जहाँ तक इस उपन्यास के संवादों का प्रश्न है, उनका संबंध सीधा-सीधा उपन्यास की पृष्ठभूमि पर निर्भर करता अहि . चूँकि मेरा संबंध मेवात से है इसलिए अपनी बात को कथा के माध्यम से कहने के लिए मैंने मेवाती संवादों को चुना . इससे एक तो कथा प्रमाणिक और विश्वसनीय बनती है, दूसरा लेखक को अपनी बात कहने में आसानी रहती है. रेणु के मैला आँचल या राही मासूम रज़ा के आधा गाँव में भी एक पाठक के सामने इस तरह की समस्या होती है, लेकिन संवादों की यहीं रंगीन मिज़ाजी रचना की ताक़त भी होती है. हालाँकि आपकी इस छोटी-सी टिप्पणी को पढ़ा कर ऐसा लगता नहीं है कि आपको उन्हें समझने किसी तरह की समस्या आई होगी . हाँ, थोडा-सा व्यवधान ज़रूर आया होगा. मेरे पहाड़े दो उपन्यास ‘काला पहाड़’ और ‘बाबल तेरा देस में’ की पृष्ठभूमि भी मेवात है .बहरहाल , आपका आभार की आपने इस पर लिखा . एक और अनुरोध कि अगर मौक़ा मिले तो मेरा हाल में वाणी से ही आये उपन्यास ‘सुर बंजारन’ क भी पढ़ना . यह उपन्यास हाथरस शैली की नौटंकी पर है.

    1. एक लेखक के तौर पर मैं ये समझ सकती हूँ। और हाँ, आप सही कह रहे हैं। मुझे समझने में कोई ख़ास परेशानी नहीं आयी, थोडा-सा व्यवधान ज़रूर आया। लेकिन बहुत सारे पाठक ऐसे होंगे जिन्हें समझने में परेशानी आ सकती है।

      बहरहाल, इस किताब को पढ़ने का अनुभव अच्छा रहा। ‘सुर बंजारन’ पढ़ने की जरूर कोशिश करुँगी। शुक्रिया !

Leave a Reply

Top