गुलज़ार : शब्दों के जादूगर

‘खिड़की पिछवाड़े को खुलती तो नज़र आता था,
वो अमलतास का इक पेड़, ज़रा दूर, अकेला-सा खड़ा था,
शाखें पंखों की तरह खोले हुए
एक परिन्दे की तरह,
बरगलाते थे उसे रोज़ परिन्दे आकर,
सब सुनाते थे परवाज़ के क़िस्से उसको,
और दिखाते थे उसे उड़ के, क़लाबाज़ियाँ खा के,
बदलियाँ छू के बताते थे, मज़े ठंडी हवा के!
आंधी का हाथ पकड़ कर शायद
उसने कल उड़ने की कोशिश की थी,
औंधे मुँह बीच-सड़क आके गिरा है!’

 

जब हम गुलज़ार साब के बारे में सोचते हैं तो अक्सर हमें एक कवि/शायर का अक्स नज़र आता है। हालांकि हम सब जानते हैं कि वो एक बेहतरीन कहानीकार और निर्देशक भी हैं। 

उनके निर्देशन की बात से एक हाल ही में प्रकाशित एक लेख की याद आती है जिसके लेखक को ऐसा लगता है कि गुलज़ार एक ‘असफल’ निर्देशक है। समझ नहीं आया की इस बात पर बुरा लगना चाहिए या हंसी आनी चाहिए। पता नहीं उस लेखक के लिए सफलता के मायने क्या हैं।

पुरानी फिल्में अब भी एक अलग सा सुकून देती हैं। अगर मैं अपनी पसंदीदा पुरानी फिल्मों की बात करूँ, तो ज्यादातर फिल्में गुलज़ार की ही होंगी। कई फिल्में तो ऐसी थीं जिन्हें मैंने कई साल पहले देखा, बहुत पसंद किया पर मुझे पता भी नहीं था कि वो गुलज़ार साहब की फिल्में थीं। जैसे परिचय, कोशिश, और खुशबू।

एक सूनी सी दोपहर को जब मैं वो फिल्म देखने बैठी, मुझे पता नहीं था एक बे-रंग सी दिखने वाली फिल्म इतनी मार्मिक होगी कि वो मेरी पसंदीदा फिल्मों में से एक बन जायेगी। मेरे मन को कुछ तरह छू जाएगी कि कई सालों बाद भी उस फिल्म के बारे में सोचने पर मेरे रोंगटे खड़े हो जाएंगे।

वो फिल्म थी ‘नमकीन’ — इस फिल्म के मुख्य कलाकार थे संजीव कुमार, वहीदा रहमान, शर्मीला टैगोर और शबाना आज़मी। विश्वास-अविश्वास और अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए जूझते रहने की कहानी है नमकीन।

गुलज़ार साब के बारे में जाने कितनी बातें लिखी गयी हैं। उन्हें किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है। आप शायद जानते ही होंगे कि उनका पूरा नाम सम्पूर्ण सिंह कालरा है। उन्होंने लगभग सतरह फिल्मों का निर्देशन किया है। कई फिल्मों जैसे —पिंजर, ओमकारा, इज़ाज़त — के गानों को उन्होंने अपनी कलम से खूबसूरत बनाया है।

‘आंधी’ और ‘मीरा’ की पटकथा और संवाद भी गुलज़ार साब ने ही लिखा है। इतना ही नहीं, बहुचर्चित टी वी सीरियल ‘मिर्ज़ा ग़ालिब’ का निर्माण भी इन्होने ही किया था। तो वो एक निर्माता भी हुए।

ऐसी बहुआयामी प्रतिभा के धनी हैं गुलज़ार!

उन्होंने कई किताबें भी लिखी हैं। ‘चौरस रात’ और ‘रावी पार’ उनकी लघु कथाओं का संग्रह है। ‘जानम’ और ‘एक बूँद चाँद’ उनकी कविताओं का संग्रह है।

बटवारे की पृष्टभूमि पर आधारित, ‘दो लोग’ गुलज़ार साहब का पहला उपन्यास है।

‘आसान नहीं था इस तरह अपनी जड़ें छोड़ कर चल देना। और उसपर ये भी नहीं पता था कहाँ और कैसे बीजे जाएंगे। बीजे जाएंगे भी या नहीं। पेड़ से टूटी शाख़ों को अक्सर देखा था। धूप में सूखते, टूटते और फिर गर्द में रूल जाते।’

{दो लोग}

दो लोग पहले हिंदी/उर्दू में लिखी गयी थी। अब अंग्रेजी में भी उसका अनुवाद किया गया है। ख़ास बात ये है कि इसका अनुवाद ख़ुद गुलज़ार साब ने ही किया है।

क्या आपने ‘दो लोग पढ़ी है? अगर हाँ तो अपने विचार {समीक्षा} हमारे साथ बाँटिये। हम उसे प्रकाशित करेंगे।
गुलज़ार साहब के शब्दों में कुछ ख़ास है। एक जादू सा। उनके शब्द सीधे आपके दिल तक पहुँचते हैं। महज़ शब्दों से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि ये उनकी ही रचना है।

अभी बस इतना ही। आपको छोड़े जाते है उनकी एक खूबसूरत शायरी के साथ —

‘एक समंदर है, जो मेरे काबू में है,

और एक क़तरा है जो मुझसे संभाला नहीं जाता।

एक उम्र है जो बितानी है उसके बग़ैर,

और एक लम्हा है जो मुझसे गुज़ारा नहीं जाता।’

 

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Tarang
Tarang Sinha is a freelance writer & author of 'We Will Meet Again'. Her works have been published in magazines like Good Housekeeping India, Child India, New Woman, Woman's Era, Alive, and a best-selling anthology @ Uff Ye Emotions 2.
http://tarangsinha.blogspot.in/

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