चंद बातें : दिव्य प्रकाश दुबे

ये किस्से हैं तुम्हारे, तुमसा ही बोलते हैं।

फुर्सत से तुम मिलो तो, सब राज़ खोलते हैं।

अपने पुराने कल को, तुम आज का पता दो।

वो भी तो हैं तुम्हारे, इतना कभी जाता दो।

इन सब कहानियों के, हीरो तो यार तुम हो,

कंधे पे हाथ रखकर पहला कदम बढ़ा दो।

 

ये शब्द हैं दिव्य प्रकाश दुबे जी के। मूल रूप से उत्तर प्रदेश के दिव्य प्रकाश जी तीन बेस्टसेलिंग किताबों के लेखक हैं। अगर आप हिंदी किताबें पढ़ते हैं, तो आपने उनकी किताबों — मसाला चाय, टर्म्स & कंडीशंस अप्लाई और मुसाफिर कैफ़े — का नाम ज़रूर सुना होगा।

 

 

तो आईये, हम आज उनसे चंद बातें करते हैं।

Writersmelon के मंच पर आपका स्वागत है। आपके लिखने की शुरुआत कैसे हुई? क्या लेखक बनना ही आपका सपना था?

शुक्रिया! ऐसा नहीं कह सकता की लेखक बनना ही मेरा सपना था। लिखने की शुरुआत दरअसल कॉलेज में एक कल्चरल फेस्ट के लिए प्ले लिखने  से हुई।

इंजीनियरिंग के बाद सॉफ्टवेयर की नौकरी करने का मन भी नहीं था और नौकरी लगी भी नहीं। उन्हीं दिनों एमबीए की तैयारी के दौरान घर के पास रहने वाले भइया, जिनकी एडवर्टाइजिंग एजेंसी थी, उनसे ऐसे ही लिखने के लिए काम माँगा। उन्होंने कहा कि एक स्कूल का एंथम सॉन्ग लिखना है। 2-3 दिन का टाइम है, लिख सकते हो क्या?

वो एंथम मैंने उन्हें एक घंटे में लिखकर दे दिया। भइया पढ़कर बड़ी देर तक सोचते रहे फिर अंदर जाकर अपना पर्स लेकर आए और 1000 रुपये देते हुए बोले — “जो लिखे हो ये उसकी सही कीमत से बहुत कम है, लेकिन 1000 रुपये इसलिए रखो ताकि तुम्हें ये विश्वास आए कि तुम लिखकर कमा सकते हो।”

एमबीए के दौरान दो लंबे प्ले लिखे जिनमें से एक आईआईएम बंगलोर के थिएटर कॉम्पटिशन की हिंदी-केटेगरी में पहला रहा। बस, लिखने में मज़ा आने लगा और अपने लिखे पर कॉन्फिडेन्स आना शुरू हो गया।

आपकी किताबों में जो एक ख़ास बात नज़र आती है वो है आपके लिखने का अंदाज़। आप बहुत ही सरल या और सरल भाषा में कहें तो ‘बोल चाल की भाषा’ का उपयोग करते हैं। इसके बारे में कुछ बताइये।

प्लेज़ लिखने के बाद मैंने कुछ शार्ट फिल्में लिखीं। पर कहानी  नहीं लिखी थीं। पढ़ने का शौक़ बचपन से रहा।पर शायद सोच या एक पाठक के तौर पर मैं बदल गया था। हिंदी की जो किताबें मैं अब पढ़ता उनमें ये कमी महसूस होती कि इन किताबों में ऐसा कुछ भी नहीं होता था जिससे हिन्दुस्तान का कोई इंजीनियरिंग करने वाला लड़का जुड़ पाए। शायद उन कहानियों के किरदार ऐसी भाषा बोल रहे थे जैसी लिखी जाती है पर आम तौर पे बोली नहीं जाती।

मैंने तभी फ़ैसला किया कि अगर कभी मैं कहानियाँ लिखूँगा तो मेरे कैरक्टर लिखी हुई हिंदी में बात नहीं करेंगे बल्कि वो वैसे ही बोलेंगे जैसे वो ‘सही’ में हैं। लिखने वाली हिंदी और बोलने वाली हिंदी/हिंदुस्तानी में कोई फ़ासला नहीं होगा। कहानी अगर तुम्हारी है तो आवाज़ भी तो तुम्हारी ही होनी चाहिए।

हिंदी को तीन शब्दों में कैसे परिभाषित करेंगे?

हिंदी इज़ कूल।

आपने उपन्यास और लघु कथाएं दोनों लिखी हैं। नावेल और शॉर्ट स्टोरी लिखने में क्या फर्क है?

शार्ट स्टोरीज़ को मैं एक तरह की तैयारी मानता हूँ। जब आप उपन्यास लिखते हैं तो उसमें एक शंका बनी रहती है कि आप 150-200 पन्नों तक अपने पाठकों को एंगेज रख पाते है या नहीं क्योंकि एक लेखक के तौर पर ये आपकी जिम्मेदारी बनती है कि जो रीडर्स आपकी किताब पर समय और पैसे दोनों खर्च करतें  है, आप उनका वक़्त बर्बाद न करें। ये ख़तरा शार्ट स्टोरीज़ में कम होता है।

क्या कोई ऐसी विधा है जिसमें लिखना आपको कठिन लगता है ?

थ्रिलर।

क्या कोई ऐसी किताब है जिसे पढ़कर ऐसा लगा हो कि ‘काश! ये किताब मैंने लिखी होती!’?

कई किताबें है। जैसे, ‘शेखर एक जीवनी’ की कुछ लाइनों ने बहुत दिन सही से सोने नहीं दिया।

–“स्कूलों में ‘टाइप’ बनते हैं, वह बना व्यक्ति।”

–“शांत बैठे रहना तपस्या नहीं है, शांत न बैठ सकने से ही तपस्या शुरू होती है।”

या फिर मनोहर श्याम जोशी जी की ‘T’ta Professor’। हालांकि मैं ऐसे नहीं सोचता कि काश! ये किताबें मैंने लिखी होती। मैं ये सोचता हूँ कि अगर मैंने लिखी होती तो कैसे लिखी होती।

आपकी कहानियां और किरदार सिर्फ आपकी कल्पना है या फिर आपके जीवन से जुडी घटनाओं से प्रेरित हैं?

दोनों। क्योंकि कहानी सच और झूठ के बीच खड़ी होती है। अगर हम रियल लाइफ की घटनाओं से प्रेरित होते भी है, तो भी कहानियों में हमारी कल्पना का बहुत बड़ा योगदान होता है। अगर ऐसा न हो तो हम अखबार ही न लिख दें? अखबार तो रियल लाइफ की ही कहानियां होती हैं।

हिंदी साहित्य के बदलते परिदृश्य के बारे में आप क्या सोचते हैं? क्या आप मानते हैं की आजकल लोग हिंदी किताबें काम पढ़ते हैं?

एक लेखक के तौर पर ये सुनकर बहुत अच्छा लगता है जब लोग कहते कि मेरी किताब उनकी पहली हिंदी किताब है।

गड़बड़ तो हुई है, पर इसकी वजह क्या है? जब मैं ये सोचता हूँ तो समझ आता है कि सबसे बड़ी गड़बड़ ये हुई के जब वेस्ट में हैरी पॉटर बड़ा हो रहा था, यहाँ बड़े हिंदी लेखकों ने बच्चों के लिए लिखना बंद कर दिया, और लेखक बच्चों के लिए लिखना बंद कर दें इससे बुरी बात हो नहीं सकती।

दूसरी समस्या ये हुई कि हिंदी के लेखक बुक प्रोमोशन से बचना चाहते थे।

पर मुझे ख़ुशी है की चीज़ें धीरे धीरे बदल रही हैं। मेरा मानना है कि वो दिन दूर नहीं जब ऐसे ही, कभी सुबह की चाय पीते वक़्त आप पाएंगे कि किसी अंग्रेजी अखबार के पहले पन्ने पर किसी हिंदी किताब का विज्ञापन होगा।

अपनी अगली किताब के बारे में कुछ बताना चाहेंगे ?

बस  इतना कि मेरी अगली किताब एक उपन्यास है और इस साल जुलाई अगस्त तक आ जायेगी।

नए/अभिलाषी लेखकों को क्या सन्देश देना चाहेंगे?

मुझे ये जानकार बड़ा अफ़सोस होता है कि आजकल लोगों के लिखने की वज़ह सही नहीं है। लिखना कोई नौकरी या इंजीनेअरिंग नहीं है। लिखने से पहले ये जानना ज़रूरी है कि आप क्यों लिखना चाहते हैं? कहीं आप इसलिए तो नहीं लिखना चाहते क्योंकि आजकल सभी लिख रहे हैं?

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Tarang
Tarang Sinha is a freelance writer & author of 'We Will Meet Again'. Her works have been published in magazines like Good Housekeeping India, Child India, New Woman, Woman's Era, Alive, and a best-selling anthology @ Uff Ye Emotions 2.
http://tarangsinha.blogspot.in/

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