चंद बातें — सुरेंद्र मोहन पाठक

SM Pathak

‘लेखकों को छोटी सी बात का बतंगड़ बनाने का तजुर्बा होता है,’ सुरेंद्र मोहन पाठक जी ने कहा और मेरे चेहरे पे अनायास ही एक मुस्कान आ गयी।

सुरेंद्र मोहन पाठक जी को किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है। उनका नाम भारत के सबसे सफलतम हिंदी मिस्ट्री उपन्यासकारों में शुमार है।

चलिए, उनसे करते है चंद ख़ास और दिलचस्प बातें —

राइटर्स मेलोन के हिंदी मंच पर आपका हार्दिक अभिनन्दन। एक उपन्यासकार के तौर पर, आपका सफ़र काफी लम्बा रहा है। इस सफ़र की शुरुआत कैसे हुई? क्या लेखक बनना ही आपका सपना था?

लेखक बनना मेरा सपना नहीं था. लेखक मुझे हालात ने बनाया. मेरा सपना तो पिता की, जिसका मैं इकलोता पुत्र था, खवाहिश पर अमल करते जैसे तैसे कोई छोटी मोटी नौकरी हासिल करना था ताकि मैं अर्निंग हैण्ड बन पाता और घर की इकॉनमी में अपनी हाजिरी लगा पाता. आखिर यही हुआ. नौकरी की, ३४ साल की, लेकिन पढने का शौक बचपन से था, बहुत पढता था, जो हाथ आ जाता था, पढता था. जो लेखक पसंद आ जाता था, उसकी रचनाएँ खोज खोज के पढता था, बार बार पढता था, इस हद तक कि लेखक का तक़रीबन लिखा मुझे याद हो जाता था. बहरहाल इतना पढ़ा कि ओवरफ्लो के हालात पैदा हो गए और एक रोज मुझे खयाल आया कि क्यों न मैं भी कुछ लिख कर देखूं!

अन्तर्प्रेरणा के हवाले जब कलम हाथ में थामी तो जेहन का कोठार खाली पाया, कागज पर उकेरने लायक मुझे उसमें कुछ भी न मिला. बहुत मायूसी हुई. फिर सोचा शायद अभ्यास से कुछ हो।

अभ्यास के लिए एक प्रसिद्ध लेखक की कहानी,जो जब मैंने पढ़ी थी तो मुझे बहुत पसंद आई थी, मैंने अपने अंदाज़ से लिखी, फिर उसे मूलकथा से मिला कर देखा कि कहाँ कहाँ मेरे से चूक हुई थी. उस कोशिश में मेरी जानकारी में आया कि कहानी में कई बातें मैंने अपनी तरफ से जोड़ दी थीं और मूल आलेख से डेढ़ गुना लिख डाला था. उस बात ने मुझे उत्साहित किया. फिर एक रोज दिमाग की मोम पिघली, मुझे अपना कुछ लिखना सूझा सन १९५९ में १९ साल की उम्र में मैंने पहली मौलिक कहानी ‘सत्तावन साल पुराना आदमी’ लिखी जो कि तब की प्रसिद्ध मासिक पत्रिका ‘मनोहर कहानियां’ में छपी और मैं – खामखाह – लेखक बन गया.

कितना कठिन या आसान था अपने आप को एक सफ़ल लेखक के रूप में स्थापित करना?

बहुत कठिन काम था. सफल लेखक के तौर पर अपने आप को स्थापित कर पाना तो दूर की बात थी, कोई मामूली, नामलेवा शिनाख्त बनाने में ही बीस साल लग गए। एक नावल छपता था और हालात ऐसे बन जाते थे कि अगला छप पाना दूभर लगने लगता था। हर बार मुतवातर यही होता रहा बहुत धक्के खाए किसी मुकाम तक पहुँचने की चाह में और फिर आखिर एक रोज ‘सब्र का फल मीठा’ वाली कहावत चरितार्थ हुई दिल को यकीन आया कि मेहनत कभी जाया नहीं जाती, उस का सिला हासिल होने में देर, ज्यादा देर लग सकती है लेकिन जाया नहीं जाती, न गयी।

सिर्फ क्राइम फिक्शन ही क्यों? इसके अलावा कोई और विधा जिसमें आपने कभी लिखा हो या लिखना चाहा हो?

शुरुआती दौर में जो कहानियां मैंने लिखी थीं, उन के से अधिकतर क्राइम फिक्शन जेनर की नहीं थी बल्कि गंभीर समाजी सरोकारों से ताल्लुक रखती कहानियां थीं। फिर सामाजिक उपन्यास भी लिखे, दो बाल उपन्यास भी लिखे लेकिन कालान्तर में मेरे पर मिस्ट्री राइटर का ऐसा ठप्पा लगा कि को पाठक-गण आखिर मुझे पसंद करने लगे थे, उन्हें मिस्ट्री स्टोरी के अलावा मेरा लिखा और कुछ मंजूर नहीं था। मैं पाठक को कंज्यूमर का दर्जा देता हूँ –जैसे उत्पादक जो बनाता है, कंज्यूमर के लिये बनाता है, वैसे ही मेरे जैसा करोबारी लेखक जो लिखता है, पाठक के लिए लिखता। मैं सुहान्त:सुखाय: लिखना अफ़ोर्ड नहीं कर सकता इसलिए जनमानससुखाय: लिखता हूँ। आखिर हलवाई मिठाई अपने लिए तो नहीं बनाता! वो कंज्यूमर के मिजाज, उस की पसंद नापसंद का खयाल नहीं रखेगा तो कैसे उसका धंधा चलेगा? तक़रीबन ऐसा ही लेखक के साथ है।

अब बतौर मिस्ट्री राइटर मेरी शिनाख्त इतनी पक्की हो चुकी है कि मैं कुछ भी लिखूं, कहलाऊंगा मिस्ट्री राइटर ही।

एक पाठक के तौर पर, क्राइम फिक्शन के अलावा आप किस तरह की किताबें पढ़ना पसंद करते है?

मैं 79 साल का हूँ, अब मेरा रुझान लिखने में ज्यादा है, पढने में कम है क्यों कि जो मैंने पढना है, उसने मेरे साथ चला जाना है और जो मैंने लिखना है – अब तक लिखा है – उसने पीछे रह जाना है। फिर भी कभी कुछ पढता हूँ तो अधिकतर अपनी किस्म के लेखकों की मिस्ट्री स्टोरीज ही पढता हूँ लेकिन जब मेरे पर ये बंदिश आयद नहीं थी, तब मैंने हर प्रकार का लेखन पढ़ा – खासतौर से उर्दू और बंगला कथाकारों को बहुत पढ़ा। इस लिए उर्दू में कृश्न चंदर, सआदत हसन मंटो, इस्मत चुगताई, ख्वाजा अहमद अब्बास, राजेंद्र सिंह बेदी, अहमद नदीम कासिमी, वाजिदा तबस्सुम और बंगला में विमल मित्र, बनफूल, शंकर, ताराशंकर बन्धोपाध्याय, समरेश बसु कैसे लेखक मेरे फेवरेट थे और आज भी है।

आपने लगभग 300 किताबें लिखीं है। वो कौन सी चीज़ है जो आपको लगातार लिखने के लिए प्रेरित करती है?

जिन्दा रहने की, जिंदगी में अपना कोई मुकाम बनाने की ख्वाहिश प्रेरित करती है। मेरे किसी नावल की तारीफ़ होती है तो दिल अभिमान से भर उठता है कि मैंने लिखा है और भावुकतावश भविष्य में और अच्छा लिखने का संकल्प मन में जाग्रित होता है। यही भावना पिछले 55 सालों से मेरे भीतर अतिरिक्त ऊर्जा भरती चली आ रही है और मैं लिखता चला जा रहा हूँ – इस ख्वाहिश के साथ कि आखिरी साँस तक कलम हाथ से न छूटे।

अपनी आत्मकथा — न बैरी न कोई बेगाना — के बारे में कुछ बताना चाहेंगे?

आत्मकथा लिखने का कभी मुझे खयाल तक नहीं आया था, न मैंने अपनी गुजश्ता जिंदगी को कभी इतना एवेंटफुल जाना था कि मैं उसको आत्मकथा की सूरत में कागज पर उकेरता।

आत्मकथा लिखने के लिए मुझे प्रकाशक ने प्रेरित किया था और फिर जब मैने अपने अंतर्मन को टटोला था तो मुझे नहीं लगा था कि मैं उस नए, अनजाने काम को अंजाम दे सकता था। फिर ये सोच कर लिखना शुरू किया कि कुछ नहीं बन पायेगा तो हाथ खड़े कर दूंगा, लेकिन लिखना शुरू किया तो जैसे कलम को पंख लग गए, परिकल्पना ने अप्रत्याशित उड़न भरी, एकमुश्त इतना लिख डाला कि 1200 प्रिंटेड पेजेज के बराबर का कलेवर बन गया।ज्ञातव्य है कि ‘न बैरी न कोई बेगाना’ मेरी आत्मकथा का पहला खंड है, अभी दो खंड और हैं जो इसी साल में आगे पीछे प्रकाशित होंगे।

हिंदी साहित्य के बदलते परिदृश्य के बारे में आप क्या सोचते है? आजकल के हिंदी लेखकों में क्या बदलाव महसूस करते हैं? क्या आपको लगता है की आजकल लोग हिंदी किताबें कम पढ़ते हैं?

हिंदी दुनिया की पांचवी सब से ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है लेकिन भारत के एकतिहाई भाग में ही इस का वर्चस्व है, कोई नामलेवा पूछ है। लिहाजा हिंदी का लेखक जितनी मर्जी तरक्की कर ले, अपने अंग्रेजी के लेखक भाई के पीछे ही रहेगा। अंग्रेजी पढना फैशनेबल है, हिंदी जैसे छुप के पढने लायक है। इसीलिए युवावर्ग में अगर दस नए पाठक पैदा होते हैं तो उन में से नौ इंगलिश के होते हैं और एक हिंदी का होता है। कैसी विडंबना है कि सरकारी तौर पर जो राष्ट्रभाषा है, वो राष्ट्र की भाषा नहीं है। अघोषित राष्ट्रभाषा अंग्रेजी है जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक और कामरूप से कच्छ तक बोली जाती है। इस परिक्षेप्य में आप खुद फैसला कर सकते हैं कि हिंदी पढने वालों की क्या पोजीशन है।

हिंदी भाषा को तीन शब्दों में कैसे परिभाषित करेंगे?

अंग्रेजी की सौतेली बहन.

क्राइम फिक्शन लिखते वक़्त किन बातों का ध्यान रखना सबसे आवश्यक है ?

मेरी निगाह में क्राइम फिक्शन लेखन के पांच अनिवार्य अंग हैं:

मुख्य:कथा की फौरी शुरुआत:

मिस्ट्री स्टोरी वही कारगर होती है जिस के मेन प्लाट में तुरंत कदम पड़ते हैं। रहस्य कथा का पाठक कदरन बेसब्रा होता है, वो नहीं कबूल कर सकता कि 300 पृष्ठों के उपन्यास के एकचौथाई पृष्ठमेन प्लाट की बैकग्राउंड बनाने में ही सर्फ़ हो जाएँ।

जीवंतपात्र:

अगर लेखक के गढ़े किरदार पाठक को पसंद आ जाते हैं तो समझिये लेखक ने आधा किला फतह कर लिया। तब पाठक आपके किरदारों में अपना खुद का अक्स तलाशता उपन्यास पढता है और ये लेखक की बड़ी उपलब्धि है।

आगे क्या हुआ:

‘हूडनइट’ पढने वालों के मन में ये कौतूहल बना रहना जरूरी है कि आगे क्या हुआ! रहस्यकथा लेखक अपने उपन्यास में ये बानगी बनाये नहीं रख पाएगा तो ये अंदेशा बराबर बना रहेगा कि पाठक कहीं उपन्यास को बीच में ही पढना न छोड़ दे!

कथोपकथनको वर्णन पर वरिअता:

लम्बे लम्बे वर्णन, आख्यान कथ्य को बोझिल, उबाऊ बनाते हैं और अक्सर देखा गया है कि पाठक ऐसी लम्बी तहरीरों को छोड़ छोड़ कर पढ़ते हैं, संवाद रोचक हों – नहीं हैं तो होने चाहियें – तो उन्हें कोई स्किप नहीं करता.

चौंकादेने वाला क्लाइमेक्स:

मिस्ट्री स्टोरी का चौंका देने वाला अंत यूँ समझिये कि पान में लौंग है. इसी वजह से मैं जब अपना नया नावल लिखने की तैयारी करता हूँ तो पहले क्लाइमेक्स फाइनल करता हूँ और फिर उसके मुताबिक कहानी को आगे से पीछे की तरफ – रिपीट, आगे से पीछे की तरफ – गढ़ता हूँ।

हज़ारो नए व अभिलाषी लेखक आपको अपना आदर्श मानते हैं। उनको आप क्या सन्देश देना चाहेंगे?

हिंदी के रहस्यकथा लेखक के लिए मेरी यही राय है कि जब इस कारोबार में कदम रखे तो नाउम्मीदी के लिए तैयार रहे। कलमकारी फिल्म वाला धंधा नहीं कि एक ही फिल्म हिट होने से हीरो स्टार बन जाए। लेखन के शिखर तक लिफ्ट नहीं जाती, सीढ़ी-दर-सीढ़ी चढ़ कर शिखर तक पहुँचना पड़ता है। जो नया लेखक ऐसी जांमारी नहीं कर सकता, वो कोई और धंधा देखे।

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Tarang
Tarang Sinha is a freelance writer & author of 'We Will Meet Again'. Her works have been published in magazines like Good Housekeeping India, Child India, New Woman, Woman's Era, Alive, and a best-selling anthology @ Uff Ye Emotions 2.
http://tarangsinha.blogspot.in/

9 thoughts on “चंद बातें — सुरेंद्र मोहन पाठक

  1. मज़ा आ गया पढ़ के. बस यही चाहते हैं की आप अनंत काल तक लिखते रहें.

  2. मज़ा आ गया पढ़ के. बस यही चाहते हैं की आप अनंत काल तक लिखते रहें., ओर हम पढते रहे।

  3. वाह!
    आप बर्फी, गुलाब जामुन, कचोरी, समोसा कुछ भी बनाइये.. आपका गुण-ग्राहक सदैव आपके दरवाज़े खड़ा है, पंक्ति बनाकर खड़ा है। दुआ है आप लिखते रहे..हम पढ़ते रहें.. आमीन।
    आभार राइटर्स-मेलोन्न इस मुलाकात के लिए.

  4. मज़ा आ गया पढ़ के. बस यही चाहते हैं की आप अनंत काल तक लिखते रहें., ओर हम पढते रहे और ये मेले यही लगते रहे।

  5. पाठक साहब को पढ़ना हमेशा ही रोचक रहता है। उनके साक्षात्कार भी उनकी बेबाकी का परिचय देते हैं। उम्मीद है उनके कलम से निकले कई और नगीनों को पढ़ेंगे। न बैरी न नो कोई बेगाना का बेसब्री से इंतजार है।

  6. आप मिठाई कोई भी बनाइये वो अच्छी अपने आप बन जायेगी सर
    आप अनंत काल तक लिखते रहे बस यही भगवान् से प्रार्थना हे

  7. इस पूरे आख्यान में ..कही बेलौस अपने अनुभवों का स्पप्र्रेक्षण … कहीं बीते वक़्त की कशिश …कहीं दिल खोल कर रख देने वाली आप की अदा… कहीं हिंदी राष्ट्र भाषा के लिए न छुप सकने वाला दर्द…कहीं अपनी अनथक मेहनत औऱ उसके फल की दिलचस्प झलक.. कहीं क्राइम फिक्शन की तरतीब वार पायदान के जरूरी पहलू और उसके साथ हमे हिप्नोटाइज़ कर देने वाला आप का अंदाज़ के बयां
    मुखतसर कहूँ तो

    ….जो भी हो तुम खुदा की कसम
    ला जवाब हो

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