मेरी प्रिय हिंदी किताबें

अगर आप writersmelon से जुड़े हैं {अगर आप किताबों से प्यार करते हैं, अगर आपकी लेखकों के प्रति जिज्ञासा है, तो आपको ज़रूर जुड़ना चाहिए}, तो आप जानते होंगे कि इस साल हमने अपने हिंदी मंच का आग़ाज़ किया है। संतोष की बात ये है कि हमें प्रतिकिया अच्छी मिली, जिसके

पुस्तक समीक्षा: मसाला चाय —दिव्य प्रकाश दुबे

"एक उम्र होती है जब क्लास की खिड़की से बाहर आसमान दूर कहीं जमीन से मिल रहा होता है और हमें लगता है कि शाम को खेलते-खेलते हम ये दूरी तय कर लेंगे। दूरी तय करते-करते जिस दिन हमें पता चलता है कि ये दूरी तय नहीं हो सकती, उसी

गुलज़ार : शब्दों के जादूगर

'खिड़की पिछवाड़े को खुलती तो नज़र आता था, वो अमलतास का इक पेड़, ज़रा दूर, अकेला-सा खड़ा था, शाखें पंखों की तरह खोले हुए एक परिन्दे की तरह, बरगलाते थे उसे रोज़ परिन्दे आकर, सब सुनाते थे परवाज़ के क़िस्से उसको, और दिखाते थे उसे उड़ के, क़लाबाज़ियाँ खा के, बदलियाँ छू के बताते थे, मज़े ठंडी

चंद बातें: पंकज दुबे

'वो तिल नहीं, तिलिस्म थे। वो रोने आयी थी या प्यार जताने, ये तो पैक्स को भी नहीं पता था। उसे बस पता था ये पल उसके लिए सबसे ख़ास है।' ---'लूज़र कहीं का' पंकज दुबे जी एक लेखक, पटकथा लेखक एवं निर्देशक हैं। उन्होंने लंदन के कॉवेन्ट्री यूनिवर्सिटी से अप्लाइड कम्युनिएशन में

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