पुस्तक समीक्षा: खिड़कियाँ — दामोदर खड़से

 

‘जीवन में किसी की उपस्थिति का एहसास रोज़ नहीं हो पाता। पर अनुपस्थिति का एहसास पल पल होता है।’

वाणी प्रकाशन द्धारा प्रकाशित, दामोदर खड़से जी की खिड़कियाँ जीवन में प्रियजनों या फिर किसी अनमोल चीज़ की अनुपस्थिति, और उस अनुपस्थिति से आपके जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव को बयान करती है। और एक महत्वपूर्ण बात ये कि किसी की अनुपस्थिति आपके जीवन को रोकती नहीं है, आप चाहें या न चाहें, आपको आगे बढ़ना ही पड़ता है। और आगे बढ़ने के लिए आपको अपनी स्मृतियाँ मिटाने की कतई आवश्यकता नहीं है।

कॉलेज के प्रोफेसर, अरुण प्रकाश ने अपनी पत्नी, आस्था, को अचानक ही खो दिया। ज्यादा दुःख की बात ये रही के अपनी-अपनी व्यस्तताओं की वजह से दोनों एक दुसरे के साथ इतना वक़्त नहीं बिता पाए। बच्चे अब सेटल हो गए हैं, और अरुण प्रकाश रिटायर। अब उनके जीवन में अकेलापन है। परम मित्र, सूर्यकांत जी हैं, पर लोग आपका अकेलापन कुछ हद तक ही बाँट सकते हैं।

वो अक्सर ‘एकांत’ में यादों में खो जाते हैं, और फिर यही एकांत उनका अकेलापन दूर करता है, उनके द्धारा शुरू की गयी एक पत्रिका के रूप में।

अरुण प्रकाश जब अपनी बेटी, निष्ठा, से मिलने अमेरिका जाते हैं, तो वो उनका इतना ख्याल रखती है की वो अभिभूत हो जाते हैं। अपने जमाई, वैभव जिनसे वो कटे कटे से रहे, का आदर सम्मान पा कर एक ख़ास जुड़ाव महसूस करने लगे। साथ ही कई लोगों से मिलकर ये जाना की सबकी अपनी-अपनी उलझनें हैं। सबका अपना एकांत।

‘मनुष्य के चेहरों की तरह उलझनों के अपने अपने चेहरे होते हैं। किसी का दुःख किसी दुसरे की तरह नहीं हो सकता। दुःख यदि मान भी लिया जाये कि एकदम समान है, तो उस दुःख को सहने वाले की संवेदना में बहुत अंतर होता है।

उनके दर्द और संघर्ष भरे जीवन की कहानी ने अरुण प्रकाश को खाकझोर दिया। और जब वो अमेरिका से लौटे तो कुछ बदले बदले से थे। क्या था वो बदलाव और क्या कुछ होगा उनके ‘ऐकांत’ में — ये जानने के लिए आपको ये उपन्यास पढ़ना होगा।

खिड़कियाँ कहानी है प्यार की, जीवन के संघर्ष की, बहुत कुछ खो कर भी बहादुरी से निरंतर आगे बढ़ने की।

‘बहादुरी कभी तात्कालिक नहीं होती…साहस आकस्मिक नहीं होता। वह चुनौतियों के साथ नए रूप में और घना हो उठता है।’

इस किताब की सबसे अच्छी बात है इस कहानी और किरदारों की सच्चाई। उनकी सहजता जैसे आपके आस-पास ही कुछ घटित हो रहा हो। संवाद भी अच्छे हैं। भावनाओ को खूबसूरती से अभिव्यक्त किया गया है। कहानी पढ़ने के दरमियान आपको कई विचार ऐसे मिलेंगे जो आपके दिल को छू लेंगे।  

बस एक बात है जो मुझे थोड़ी परेशां करती रही और वो है — कंफ्लिक्ट। वैसे तो अरुण प्रकाश इस किताब के नायक/कथावाचक हैं, पर उनके जीवन के फ्लैशबैक (जो खिड़कियाँ की कहानी का एक छोटा हिस्सा भर है) के कुछ हिस्से को छोड़ दिया जाये तो अरुण प्रकाश की ज़िन्दगी में कोई कॉन्फ्लिक्ट नहीं है। अन्य लोगों, जिनसे अरुण प्रकाश मिलते है, की जटिल समस्याएं ही इस कहानी का आधार है। कई लोगों की कहानियों को समेटने की कोशिश में, ऐसा लगता है जैसे खिड़कियाँ की कहानी कहीं-कहीं बिखर सी गयी हों। 

खिड़कियाँ कोई हलकी फुल्की कहानी नहीं है। जीवन की कई संवेदनाओं से भरी, जटिलताओं से भरी एक गंभीर कहानी है। अगर आपको ऐसी कहानियां पसंद हैं, तो आपको दामोदर जी की खिड़कियाँ पढ़नी चाहिए।

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Tarang
Tarang Sinha is a freelance writer & author of 'We Will Meet Again'. Her works have been published in magazines like Good Housekeeping India, Child India, New Woman, Woman's Era, Alive, and a best-selling anthology @ Uff Ye Emotions 2.
http://tarangsinha.blogspot.in/

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