गुलज़ार : शब्दों के जादूगर

'खिड़की पिछवाड़े को खुलती तो नज़र आता था, वो अमलतास का इक पेड़, ज़रा दूर, अकेला-सा खड़ा था, शाखें पंखों की तरह खोले हुए एक परिन्दे की तरह, बरगलाते थे उसे रोज़ परिन्दे आकर, सब सुनाते थे परवाज़ के क़िस्से उसको, और दिखाते थे उसे उड़ के, क़लाबाज़ियाँ खा के, बदलियाँ छू के बताते थे, मज़े ठंडी

चंद बातें: पंकज दुबे

'वो तिल नहीं, तिलिस्म थे। वो रोने आयी थी या प्यार जताने, ये तो पैक्स को भी नहीं पता था। उसे बस पता था ये पल उसके लिए सबसे ख़ास है।' ---'लूज़र कहीं का' पंकज दुबे जी एक लेखक, पटकथा लेखक एवं निर्देशक हैं। उन्होंने लंदन के कॉवेन्ट्री यूनिवर्सिटी से अप्लाइड कम्युनिएशन में

पुस्तक समीक्षा: द फिलॉसॉफर्स स्टोन — प्रेम एस गुर्जर

‘लोग आगे बढ़ने में इतना डरते क्यों हैं? किनारे से ही हार मान लेना कितना सरल है। बहुत कम लोग होते हैं जो पूर्ण निष्ठा से अपनी नियति को प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। ‘ प्रेम एस गुर्जर  , फिलॉसोफेर्स स्टोन फिलॉसॉफर्स स्टोन कहानी है एक चरवाहे की जो अलग अलग तरह की किताबों

चंद बातें: अंकिता जैन

  'कितना ही दूर रह लो, लेकिन अपने गाँव की भाषा चुटकियों में आपको गाँव से जोड़ देती है।' अंकिता जैन, ऐसी वैसी औरत  अंकिता जी एक उभरती हुई लेखिका हैं। इनकी लिखी हुई कविताएँ, कहानियाँ, और लेख अख़बारों और ऑनलाइन पोर्टल में नियमित प्रकाशित होते रहते हैं। इन्होने रेडियो-ऍफ़एम् के दो प्रसिद्ध

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