चंद बातें — अनु सिंह चौधरी

अगर आप लेखक हैं या पढने के शौक़ीन हैं, तो एक चीज़ जो आपको ज़रूर आकर्षित करती होगी वो है विभिन्न लेखकों के मन के विचारों को जानना। आज ‘चंद बातें’ में हम मुखातिब होंगे ‘नीला स्कार्फ़’ और ‘मम्मा की डायरी’ की लेखिका अनु सिंह चौधरी जी से —

 

Writers Melon के मंच पर आपका स्वागत है। पाठकों को कुछ अपने बारे में बताइये।

शुक्रिया तरंग! पहला सवाल ही कितना मुश्किल है! सर्च इंजन के दम पर दौड़ती-भागती इस दुनिया में अपने बारे में कैसे और क्या बताया जाए! चलिए, फिर भी कोशिश करती हूँ। सिवान (बिहार) में पैदा हुई, राँची (झारखंड) में पली-बढ़ी, दिल्ली यूनिवर्सिटी (लेडी श्रीराम कॉलेज) और भारतीय जनसंचार संस्थान (जिसको आईआईएमसी भी कहते हैं) से पढ़ाई की। एक टीवी न्यूज़ चैनल में काम किया, और फिर २००७ से स्वतंत्र रूप से काम कर रही हूँ। इन दिनों दिलली, मुंबई और गैंगटॉक के बीच कहीं अपना ठिकाना ढूँढने की कोशिश में हूँ। ख़ुद को मौक़ापरस्त कहती हूँ। जब जो अवसर सामने दिखाई देता रहा, उसे अपना समझकर कई सारे प्रयोग किए ज़िन्दगी के साथ। डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में बनाईं। अख़बारों के लिए कॉलम लिखे। अनुवाद किया। किताबें एडिट की। ब्लॉगिंग की। कम्युनिकेशन्स कन्सलटेंट के तौर पर काम किया। रेडियो पर नीलेश मिसरा के शो के लिए कहानियाँ लिखीं। इस बीच किरदार ज़ेहन के दरवाज़े पर दस्तक देते रहे तो उन्हें भीतर आने दिया, और फिर कहानियों का सिलसिला चल पड़ा। अपने कुछ कामों को लेकर शुक्रगुज़ार रहती हूँ कि मुझे ये मौक़े मिले – पहला, ‘नीला स्कार्फ़’ और ‘मम्मा की डायरी’। दूसरा, 2007 में झारखंड के जंगलों में पहाड़िया आदिवासियों पर बनाई हुई अपनी पहली डॉक्युमेंट्री – ‘लाइटिंग अप द हिल्स’। तीसरा, ‘गाँव कनेक्शन’ अख़बार के लिए की हुई रिपोर्टिंग, जो मैंने ख़ूब मन से की। और चौथी, ‘द गुड गर्ल शो’ नाम की एक वेब सीरिज़ जो मैंने अपनी कंपनी डोपामीन मीडिया एंड एन्टरटेन्मेंट के लिए लिखी और डायरेक्ट की। ये वेब सीरिज़ फिलहाल यूट्यूब पर है, और उस पर दर्शकों की प्रतिक्रिया पढ़ती हूँ तो लगता है कि कई क़िस्से हैं जो अभी कहे जाने बाक़ी हैं। जिन्हें शब्दों और किरदारों में ढालने की तकलीफ़ेह और चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया कभी भी ज़ाया नहीं जाती।


क्या आप हमेशा से ही लेखक बनना चाहती थीं?

कहा न कि मैं मौक़ापरस्त रही हूँ। इसलिए ये कहना मुश्किल है कि मैं दरअसल ‘चाहती’ क्या थी। हाँ, अपने भीतर पलनेवाली कहानियाँ कह पाने की छटपटाहट रही होगी ज़रूर। इसलिए तो यहाँ तक पहुँच पाई हूँ।


आजकल अंग्रेजी लेखन का काफी चलन है। मगर आपने हिंदी को चुना। कोई ख़ास वजह?

हिंदी मुझे अंग्रेजी से कहीं बेहतर आती है। हिंदी मेरी ज़ुबान है। हिंदी में मैं अनायास सोचती हूँ, लिखती हूँ। अंग्रेज़ी तो हासिल की हुई ज़ुबान है। ज़ाहिर है, अंग्रेज़ी में हाथ तंग ही रहेगा। हालाँकि ये भी सच है कि मैं भाषा को लेकर बिल्कुल दुराग्रही नहीं हूँ। कई बार कुछ बातें अंग्रेज़ी में लिखना ज़्यादा आसान, स्वाभाविक और प्रासंगिक लगता है। तब अंग्रेज़ी का इस्तेमाल कर लेती हूँ। वैसे आपने ये इंटरव्यू अंग्रेज़ी में लिया होता तो मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि मेरा सेंस ऑफ़ ह्यूमर थोड़ा और निखरकर सामने आता। 🙂


हिंदी भाषा को तीन शब्दों में कैसे परिभाषित करेंगी?

अक्षत। निरंतर। बहुआयामी।


नीला स्कार्फ़ और मम्मा की डायरी के बारे में कुछ बताएं। आपको लिखने की प्रेरणा कहा से मिलती है? अपने अगले उपन्यास के बारे में कुछ बताना चाहेंगी? 

नीला स्कार्फ़ बारह कहानियों का संग्रह है, और जैसा कि नाम से ज़ाहिर है, मम्मा की डायरी संस्मरण है – एक डायरी ही समझिए उसे। दोनों किताबें हिन्द युग्म नाम से आई हैं। हिन्द युग्म के संपादक शैलेश भारतवासी से मेरी पहली पहचान ब्लॉगिंग की दुनिया के ज़रिए हुए। मैं उन दिनों मैं घुमन्तू नाम का एक ब्लॉग लिखा करती थी। टुकड़ों-टुकड़ों में डायरी और संस्मरण जैसा कुछ, जिसमें पेरेन्टिंग नोट्स भी होते थे। वो नोट्स तब ख़ासे लोकप्रिय रहे। मैं तब पेरेन्टिंग के कुछ लेखों को लेकर एक नॉन-फ़िक्शन किताब लिखने के बारे में सोच रही थी। शैलेश उस किताब को छापने के लिए राज़ी हो गए। तब तक मेरी कुछ कहानियाँ भी तैयार थीं। तब शैलेश की ओर से सुझाव आया कि नीला स्कार्फ़ के नाम से ये कहानियाँ पहले छपनी चाहिए। नीला स्कार्फ़ कई मूड्स, कई मिज़ाजों की कहानियाँ हैं। कई पृष्ठभूमियों की कहानी है। गाँव-जवार है, कस्बा है, दिल्ली है, मुंबई है। ट्रेन की एक यात्रा है। अल्ज़ाइमर्स से जूझते एक दंपत्ति की कहानी है। लिव-इन और ब्रेक अप के क़िस्से हैं। दूसरी ओर, मम्मा की डायरी में मेरी ही डायरी के कई पन्ने हैं, और कई सारी माँओं की दास्तान है। दोनों किताबें जुदा ज़रूर हैं, लेकिन उनमें एक बात कॉमन है। जो देखा है, जैसा जिया है, वैसा लिखा है मैंने। तो बस लिखने की प्रेरणा ज़िन्दगी से ही मिलती है।

अगला उपन्यास दिल्ली यूनिवर्सिटी की पृष्ठभूमि पर आधारित है। बल्कि द गुड गर्ल शो का रिवर्स एडैप्टेशन है। किरदार वेबसीरिज़ के ही हैं, लेकिन उपन्यास में ये किरदार आपको दिल्ली की उन सतहों को कुरेदता है जो अख़बार की सुर्ख़ियों में तो दिखाई देते हैं लेकिन उनके परे की दुनिया की हम कम ही छान-बीन करना चाहते हैं।


आपके प्रिय लेखक/लेखिका कौन हैं? और क्यों?

नाम कई हैं, वजह कई। मैं कम-से-कम शब्दों में समेटने की कोशिश करूँगी, लेकिन आगाह कर दूँ कि ये जवाब लंबा हो सकता है। शिवानी वो साहित्यकार थीं जिन्होंने मेरे भीतर की किशोर लड़की के इरादों को मज़बूती दी और सपनों को पंख दिया। मेरे लिए शिवानी आधुनिकता और परंपरा का अद्भुत और दिलचस्प संगम रहीं। उनका लेखन और उनका जीवन, दोनों सहज, सरल और सादा रहा। मुझे ये कहने में कोई गुरेज नहीं कि शिवानी मेरे लिए एक रोल मॉडल हैं। पीढ़ियों के फ़ासले के बावजूद। अमृता प्रीतम के बारे में क्या कहूँ! प्रेम का पहला सबक इनसे सीखा। अमृता की शायरी में, उनके किरदारों में एक मैं ही क्या – मुझ जैसी न जाने कितनी लड़कियों ने अपने टूटे हुए दिलों की किरचें चुना करते हैं। इस्मत चुगताई, उनके ‘विट’ और डार्क ह्यूमर के लिए। अत्यंत नीरस और साधारण को ख़ास कैसे बनाया जाता है, ये समझना हो तो इस्मत आपा को पढ़ना चाहिए कई बार। मनोहर श्याम जोशी – ऐसा लेखक यदा-कदा ही पैदा होता है। जोशी जी एक नहीं, कई विधाओं के मास्टर थे – उपन्यासकार, व्यंग्यकार, पत्रकार, और स्क्रिप्टलेखक भी। नाइजीरियन लेखिका चिममंदा एनगोजी अदिचि – अपने निर्भीक लेखन के लिए। पिको अय्यर – उनके ट्रैवेल लेखन और घर को लेकर उनकी अवधारणा की वजह से मैं उनकी मुरीद हूँ और रहूँगी। गुलज़ार – ये नाम ही बहुत है, लेकिन फिर भी अगर आप पूछे क्यों तो मैं कहूँगी उनके ‘बॉडी ऑफ़ वर्क’ की वजह से। कितने लेखक हैं इस दुनिया में जो फ़िल्मकार, गीतकार, कहानीकार, स्क्रिप्टलेखक, उपन्यासकार, अनुवादक और बच्चों के कहानीकार हैं! महाश्वेता देवी – अपनी पूरी ज़िन्दगी लेखन को समर्पित कर दी उन्होंने, और लेखन से कभी सामाजिक सरोकारों को अलग नहीं होने दिया। अरुंधती सुब्रमनियम – उनकी कविताएँ मुझे बहुत दार्शनिक, और बहुत स्पिरिचुअल लगती हैं। इसके अलावा रोआल्ड डैल, ओ. हेनरी, एनिड ब्लाइटन, अगाथा क्रिस्टी, मोपासां, सच्चिदानंद हीरानंद वात्सयायन अज्ञेय और राहुल सांत्कृत्यायन।


कोई ऐसी किताब जिसे पढ़कर आपको ऐसा लगा हो ‘कि काश ये किताब मैंने लिखी होती!’?

सुरेन्द्र वर्मा की ‘मुझे चाँद चाहिए’।


आप ज्यादातर किन शैलियों में लिखना पसंद करती हैं?

मेरी सबसे पसंदीदा विधा लघु कहानियाँ हैं। शैली हालाँकि कहानी और किरदार तय करते हैं।

सोशल मीडिया आजकल जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया है। आपके अनुसार ये मंच लेखकों के लिए कितना उपयोगी है?

इस बारे में मेरी राय मिली-जुली है। इसमें कोई दो राय नहीं कि सोशल मीडिया लेखकों को एक बड़ा पाठक वर्ग देता है। पाठक और लेखक के सीधे संवाद का ज़रिया बनता है। लेकिन सोशल मीडिया भ्रांतियाँ भी पैदा करता है, डेल्यूज़नल भी है। हम लेखक टाईप लोगों के जिगरे मज़बूत नहीं होते। जितनी जल्दी तारीफ़नुमा चने की झाड़ पर चढ़कर आसमान से तारे तोड़ लाने का ख़्वाब देखने लगते हैं उतनी ही जल्दी अपने अहं को लगने वाली बड़ी-छोटी ठोकरें गिनने लग जाते हैं। मैंने पिछले दस साल सोशल मीडिया का फ़ायदा उठाया है, उसे उपयोगी पाया है। ख़ूब वक़्त दिया है फ़ेसबुक और ब्लॉग को। साल २०१८ में सोशल मीडिया से जुदा होकर ये देखना चाहती हूँ कि एक लेखक के तौर पर इसका क्या-क्या नुकसान हो सकता है मुझे। अगले साल इसी दिन, इसी महीने अपने तजुर्बे आपसे बाँटूगी। फिर बता पाऊँगी कि वाकई में ये मंच लेखकों के लिए कितना उपयोगी होता है।

नए अथवा अभिलाषी लेखकों के लिए आपका क्या सन्देश होगा?

लिखिए। लिखते रहिए। बस लिखिए। बाक़ी सब बेमानी है। भ्रांति है। मृगमरीचिका है। एक लिखना – लिख पाना – ही आपके वजूद का सबसे बड़ा सच है।

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Tarang
Tarang Sinha is a freelance writer & author of 'We Will Meet Again'. Her works have been published in magazines like Good Housekeeping India, Child India, New Woman, Woman's Era, Alive, and a best-selling anthology @ Uff Ye Emotions 2.
http://tarangsinha.blogspot.in/

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