एक मुलाक़ात मेरे प्रिय साहित्यकार के साथ

प्रकाश से मेरी दोस्ती कुछ नाटकीय ही थी। उस समय मैं सोलन में कार्यरत था और किसी को वहाँ जनता भी नहीं था। बिहार से बाहर रहते हुए हिंदी भाषा, विशेषकर शुद्ध हिंदी भाषा के जानकर बहुत कम ही मिलते हैं। वहाँ का माहौल भी कुछ ऐसा ही था। एक बार मैं ऐसे ही शाम को रेलवे ट्रैक के पास टहल रहा था और अचानक मुझे एक व्यक्ति बड़ी शुद्ध हिंदी में बात करता दिखा। मैं बड़ा प्रभावित हुआ और बातों बातों में हमारी दोस्ती शुरू हुई। शायद हम दोनों ही एक दूसरे के टक्कर के थे। तो ये कहा जा सकता है कि हमारी दोस्ती की आधारशिला हिंदी ही थी। दूसरी जो सामान बात थी वो थी पुस्तकों के प्रति हमारा प्रेम। मैं पुस्तकों का शौक़ीन तो हूँ लेकिन उसे पढ़ने के बाद संभाल के रखना मेरे स्वाभाव में नहीं है जबतक वो पुस्तक कुछ अधिक ही खास हो किन्तु प्रकाश के घर का माहौल कुछ और ही था। हिंदी और पुस्तकें उसके परिवार और जीवन का एक हिस्सा थी। उससे जब परिचय बढ़ा तो पता चला कि केवल वो ही नहीं, उसके परिवार में सभी लोग हिंदी के विद्वान हैं।

२०१३। मैं दिल्ली आ चुका था। उबाऊ दिनों में तब मिठास आयी जब एक रोज अचानक प्रकाश कुछ दिनों के लिए मेरे पास आया।
‘चलो कहीं घूम आते हैं,’ एक दिन रविवार की शाम प्रकाश ने अचानक कहा।

मैं बड़े असमंजस में पड़ गया। मेरे जैसे कंपनी के मजदूर के लिए रविवार बड़ा अमूल्य होता है और इसे इस प्रकार घूम फिर कर बिताना मेरे विचार से समझदारी नहीं थी। मैंने कहा कि इससे अच्छा घर पर ही आराम करते हैं किन्तु प्रकाश कहाँ मानने वाला था। उसे मना नहीं कर सकता था इसी कारण उसके साथ हो लिया।

रास्ते में पता चला कि हम प्रगति मैदान, विश्व पुस्तक मेले में जा रहे हैं। मैं प्रसन्न हो गया। उसका एक कारण ये भी था कि पिछले साल मेरी एक पुस्तक, स्वयंवर, प्रकाशित हुई थी और मुझे नहीं, किन्तु प्रकाश के ये याद था कि शायद वो पुस्तक हमें पुस्तक मेले में दिख जाये। खैर हम प्रगति मैदान में पहुँचे और वहाँ का माहौल देख कर मुझे बड़ा संतोष हुआ और ख़ुशी हुई कि मैं वहां गया। मुझे अंदाजा नहीं था की आगे जो होने वाला था वो मुझे और भी ज्यादा उत्साहित करने वाला था।

एक हिंदी और पुस्तक प्रेमी होने के कारण मुझे हमेशा ये शिकायत रही है कि हिंदी और पुस्तकों का चलन अब कम होता जा रहा है लेकिन वहाँ हजारों की संख्या में पुस्तक प्रेमियों को देख कर मन प्रसन्न हो गया। हाँ ये अलग बात थी की उनमे से अधिकतर पुस्तक प्रेमियों का झुकाव अंग्रेजी पुस्तकों की तरफ था।

हमलोग सबसे पहले डायमंड बुक्स के स्टाल में पहुँचे जिन्होंने मेरी पुस्तक “स्वयंवर” को प्रकाशित किया था, और मेरी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा जब मैंने अपनी पुस्तक को वहाँ प्रदर्शनी में लगे देखा। उस अहसास को शब्दों में बताना बड़ा कठिन है। हमने कुछ तस्वीरें ली और फिर कुछ और दुकानों से होते हुए वापस जाने के लिए मुड़े ही थे कि मेरी नजर एक जानी पहचानी शख़्सियत पर पड़ी और ठहर गयी।

इससे पहले मैंने उन्हें सिर्फ तस्वीरों और टीवी पर देखा था। वो अशोक चक्रधर थे। वहां कोई सभा होने वाली थी और काफी भीड़ लगी हुई थी। हम फटाफट वहाँ पहुँचे और अशोक जी को नमस्कार किया। उन्होंने हमारे नमस्कार का जवाब दिया और जल्दी से हमें बैठने को कहा। हम चुप चाप बैठ गए। कुछ समय के पश्चात मेरी नज़र एक ऐसे व्यक्ति पर पड़ी जिनका मैं बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ। उन्हें देखने की इच्छा बचपन से थी पर कभी देख सकूंगा इसका भरोसा नहीं था। वही उस सभा के मुख्य अतिथि थे और जब घोषणा हुई कि वे मंच पर आने वाले हैं, मुझे यकायक विश्वास ही नहीं हुआ। वो हिंदी भाषा के सबसे सम्मानित साहित्यकारों में से एक, नरेंद्र कोहली थे। बचपन में मुझे एक बार उनका एक उपन्यास “अवसर” पढ़ने का अवसर मिला और मैं उनकी लेखनी का कायल हो गया। और आज उन्ही को अपने सामने देख बड़ी प्रसन्नता हो रही थी।

करीब आधे घंटे तक वो कार्यक्रम चला और उसके बाद दर्शकों से प्रश्न पूछने को कहा गया। सबसे पहला प्रश्न अशोक चक्रधर जी ने ही पूछा। उनके अनुसार वे नरेंद्र कोहली के बहुत बड़े प्रशंसक थे और उनके दैनिक दिनचर्या के बारे में जानना चाहते थे। स्वयं इतने बड़े साहित्यकार के द्धारा इस प्रकार प्रश्न सुनकर मुझे थोड़ी हैरानी हुई पर नरेंद्र कोहली ने बड़ी आत्मीयता से उसका उत्तर दिया। उनके वार्तालाप में एक गुरु और शिष्य जैसा भाव छुपा हुआ था। मैं इस मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहता था और मैंने भी उनसे एक प्रश्न किया। सच पूछें तो मुझे याद नहीं कि उन्होंने क्या उत्तर दिया क्यूंकि मैं तो प्रश्न पूछने का मौका पाकर ही अभिभूत था।

जब सभा समाप्त हुई तो मैं और प्रकाश मंच पर गए और अपनी लिखी पुस्तक नरेंद्र कोहली जी को भेंट की। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि कहा क्या जाये इसलिए मैंने हड़बड़ी में कह दिया कि, “मैंने एक बुक लिखी है और चाहता हूँ आप उसे पढ़ें।”

नरेंद्र जी ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया “अगर बुक है तो अपने पास ही रखिये। हाँ अगर कोई पुस्तक लिखी है मैं पढ़ना चाहूंगा।” मैंने झेंपते हुए उन्हें “स्वयंवर” भेंट की और भला हो प्रकाश का जिसने उस पल को कैमरे में कैद कर लिया। यही नहीं, वापसी के दौरान, अशोक चक्रधर जी से भी भेंट हो गयी और उन्हें भी अपनी पुस्तक भेंट करने का अवसर मिला।

वाकई कभी कभी कुछ ऐसा अप्रत्याशित हो जाता है जो कभी सोचा नहीं होता। अगर प्रकाश जिद ना करता तो शायद मैं अपने घर पर बैठा टीवी ही देखता रहता। ये जो अनुभव मैं विश्व पुस्तक मेला से लेकर आया, उससे अनजान रह जाता।

तो जीवन ऐसा ही है। अनुभव होते रहते हैं। कुछ अच्छे, कुछ बुरे पर सबसे बड़ी बात ये है कि क्या हम अच्छे बुरे की फ़िक्र छोड़ कर उस तथाकथित अनुभव को एक अवसर देते हैं? देकर देखिये। क्या पता वो आपके जीवन का सबसे कीमती अनुभव बन जाये।

 

नीलाभ वर्मा पेशे से इंजीनियर हैं और लेखन उनकी रूचि है। इन्हें पढ़ने का शौक़ है। हिंदी साहित्य की ओर इनका विशेष झुकाव है। पौराणिक उपन्यास, स्वयंवर, के लेखक हैं। इनका ब्लॉग, धर्मसंसार, भारत का पहला धार्मिक ब्लॉग है।

Blog: www.dharmsansar.com/ Twitter: @NilabhVerma

 

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Tarang
Tarang Sinha is a freelance writer & author of 'We Will Meet Again'. Her works have been published in magazines like Good Housekeeping India, Child India, New Woman, Woman's Era, Alive, and a best-selling anthology @ Uff Ye Emotions 2.
http://tarangsinha.blogspot.in/

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